Skip to main content

Posts

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत

  प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांंत Principles of Naturopathy प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त इस प्रकार हैं - प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में दवाइयों का प्रयोग नहीं किया जाता है। - प्राकृतिक चिकित्सा में रोग एक, कारण एक तथा चिकित्सा भी एक ही होती है।  - रोगो का मूल कारण कीटाणु नही होते है। - तीव्र रोग शत्रु नही मित्र होते है। - प्रकृति स्वयं चिकित्सक है। - चिकित्सा रोग की नहीं शरीर की होती है। - रोग निदान की विशेष आवश्यकता नही होती है। - जीर्ण रोगो के आरोग्य में कुछ समय अधिक लगता है। - शरीर, मन, आत्मा का इलाज है प्राकृतिक चिकित्सा  - प्राकृतिक चिकित्सा में उभार की सम्भावना होती है। 1. प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में दवाइयों का प्रयोग नहीं किया जाता है- प्राकृतिक चिकित्सा में केवल 5 तत्वो मिट्टी, पानी, अग्नि, हवा, आकाश एवं छठा तत्व परम पिता जगत नियन्ता जगत का सृजनकर्ता ईशतत्व है, इस चिकित्सा में आहार के रूप में फल, साग सब्जी अनाजों का प्रयोग होता है इनमें भी भरपूर पांच तत्व है,संसार का कोई प्राणी या पौधा जो सजीव है बढ रहा है उन सब मे यही पांच तत्व विघमान है। इन पांच...

प्राकृतिक चिकित्सा की अवधारणा

प्राकृतिक चिकित्सा की अवधारणा Concept of Naturopathy -  वर्तमान समय में भिन्न-भिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोग बढते ही जा रहे है। जिनकी भिन्न-भिन्न प्रकार से चिकित्सा की जा रही है परन्तु चिकित्सा के उपरान्त भी इन रोगों की संख्या तथा इन रोगों से पीडित रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इन रोगों के परिपेक्ष्य में प्राकृतिक चिकित्सा एक उपयोगी, सरल, सुलभ तथा स्थाई समाधान है। प्राकृतिक चिकित्सा वास्तव में कोई चिकित्सा शास्त्र ना होकर हमारे जीवन की एक शैली है जिसके अर्न्तगत हम प्रकृति के समीप रहकर प्राकृतिक नियमों का पालन करते है। इसका सम्बन्ध हमारी सभ्यता और संस्कृति से है हमारे पूर्वज इसके साथ अपने जीवन को जोड़कर सौ वर्षों की स्वस्थ आयु को प्राप्त करते थे परन्तु जब से हमने इस जीवन शैली से दूर होकर अप्राकृतिक जीवन शैली को अपनाया तभी से भिन्न-2 प्रकार के रोगों ने हमारे जीवन को घेर लिया।    प्राकृतिक जीवन क्या है- प्रकृति के अनुरुप जीवन यापन करना प्राकृतिक जीवन कहलाता है। दूसरे शब्दों में जीवन को प्रकृति के अनुसार जीना ही प्राकृतिक जीवन कहलाता है। प्राचीन समय में व्यक्त...

हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध

  हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध हठयोग प्रदीपिका में मुद्राओं का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम जी ने कहा है महामुद्रा महाबन्धों महावेधश्च खेचरी।  उड़्डीयानं मूलबन्धस्ततो जालंधराभिध:। (हठयोगप्रदीपिका- 3/6 ) करणी विपरीताख्या बज़्रोली शक्तिचालनम्।  इदं हि मुद्रादश्क जरामरणनाशनम्।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/7) अर्थात महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयानबन्ध, मूलबन्ध, जालन्धरबन्ध, विपरीतकरणी, वज़्रोली और शक्तिचालनी ये दस मुद्रायें हैं। जो जरा (वृद्धा अवस्था) मरण (मृत्यु) का नाश करने वाली है। इनका वर्णन निम्न प्रकार है।  1. महामुद्रा- महामुद्रा का वर्णन करते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है- पादमूलेन वामेन योनिं सम्पीड्य दक्षिणम्।  प्रसारितं पद कृत्या कराभ्यां धारयेदृढम्।।  कंठे बंधं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः।  यथा दण्डहतः सर्पों दंडाकारः प्रजायते  ऋज्वीभूता तथा शक्ति: कुण्डली सहसा भवेतत् ।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/9,10)  अर्थात् बायें पैर को एड़ी को गुदा और उपस्थ के मध्य सीवन पर दृढ़ता से लगाकर दाहिने पैर को फैला कर रखें...

बंध एवं मुद्रा का अर्थ , परिभाषा, उद्देश्य

  मुद्रा का अर्थ एवं परिभाषा  'मोदन्ते हृष्यन्ति यया सा मुद्रा यन्त्रिता सुवर्णादि धातुमया वा'   अर्थात्‌ जिसके द्वारा सभी व्यक्ति प्रसन्‍न होते हैं वह मुद्रा है जैसे सुवर्णादि बहुमूल्य धातुएं प्राप्त करके व्यक्ति प्रसन्‍नता का अनुभव अवश्य करता है।  'मुद हर्ष' धातु में “रक्‌ प्रत्यय लगाकर मुद्रा शब्दं॑ की निष्पत्ति होती है जिसका अर्थ प्रसन्‍नता देने वाली स्थिति है। धन या रुपये के अर्थ में “मुद्रा' शब्द का प्रयोग भी इसी आशय से किया गया है। कोष में मुद्रा' शब्द के अनेक अर्थ मिलते हैं। जैसे मोहर, छाप, अंगूठी, चिन्ह, पदक, रुपया, रहस्य, अंगों की विशिष्ट स्थिति (हाथ या मुख की मुद्रा)] नृत्य की मुद्रा (स्थिति) आदि।  यौगिक सन्दर्भ में मुद्रा शब्द को 'रहस्य' तथा “अंगों की विशिष्ट स्थिति' के अर्थ में लिया जा सकता है। कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने के लिए जिस विधि का प्रयोग किया जाता है, वह रहस्यमयी ही है। व गोपनीय होने के कारण सार्वजनिक नहीं की जाने वाली विधि है। अतः रहस्य अर्थ उचित है। आसन व प्राणायाम के साथ बंधों का प्रयोग करके विशिष्ट स्थिति में बैठकर 'म...